गुलाबी शहर और आतंक का मंज़र

अंतर्मन कल शाम से मन उदास है। बदलती फिज़ा शायद अहसास दिला रही है कि बहुत कुछ बदल गया और उतनी ही तेजी से बदलता जा रहा है। मुठ्ठी से दरकती रेत की मानिंद । "पधारो म्हारे देस" की गुहार लगाने वाला गुलाबी नगर कल लाल रंग से रंग दिया गया। महज आतंक फैलाने के लिये। ये... [पूरी पोस्ट]
writer anuradha srivastav
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[14 May 2008 04:31 AM]

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