आईना
आईना अपनी वाणी को झोली में बांध दुछत्ती पर चढा मैं खूश हूं भूल चुकी कभी मैं भी प्रतिक्रिया व्यक्त करती थी होते देख अन्याय सुलग पडती थी अब नजरिया बदल हर बात में कारण खोज लेती हूं ऐसा तो होना ही था मान लेती हूं गलती शायद मेरी ही है खुद को समझा लेती हूं...
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anuradha srivastav
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[17 Dec 2008 03:56 AM]



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