क्षणिकाएं

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर जमीं से आसमां बहुत दूर है, फिर मिलते से नज़र आते क्यों हैं, जब गिराने ही होते हैं मुकीमों को वो सारे मकाम, तो आसमां से मिलते मंजरों को बनाते क्यों हैं? अपने आप को खुद से छिपाए बैठे हैं, हम तो दर्द को भी दिल में दबाये बैठे हैं. जो अपने दर्द से प्यार कि... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[16 Aug 2009 19:10 PM]

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