दो कवितायें

नई क़लम  - उभरते हस्ताक्षर मन चंचल गगन पखेरू है, मैं किससे बाँधता किसको. मैं क्यों इतना अधूरा हूँ, की किससे चाह है मुझको. वो बस हालात ऐसे थे, कि बुरा मैं बन नहीं पाया. मैं फ़रिश्ता हूँ नहीं पगली, कोई समझाए तो इसको. ज़माने की हवा है ये, ये रूहानी नहीं साया. मगर ताबीज़ ला दो तुम,... [पूरी पोस्ट]
writer नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[16 Aug 2009 19:13 PM]

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