तुम्हारा है नहीं जो क्यों उसे अपना बताते हो....
काव्य जगत के अनुभवी एवं हमारे मार्गदर्शक कवि 'खलिश' जी की एक रचना जो वास्तव में जीवन दर्शन है... तुम्हारा है नहीं जो क्यों उसे अपना बताते हो जो अपना हो नहीं सकता उसे अपना बनाते हो ये नश्वर देह नित्य है मगर देही है अनित्य भला क्यों भेद देह और देही का...
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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[18 Aug 2009 17:41 PM]



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