स्त्री

मेरी परिक्रमा... तुम्हारी सादगी, स्नेह, समर्पण अपनी प्रेरणा बनकर रमते देखा है परिवार रिश्तों को सहेजते तुम्हें मुझसे उपर उठते देखा है असम्भव से सम्भव का प्रयास सपनों को धरातल पर बुनते देखा है जब जब हारा और मैं पस्त हुआ तुम्हें दिशा बनकर बिछते देखा है किसनें कहा फरिश्... [पूरी पोस्ट]
writer Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]

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