मैं कुछ दिनों तनहाई चाहती हूँ

मेरी परिक्रमा... मैं कुछ दिनों तनहाई चाहती हूँ हर बन्धन से बिदाई चाहती हूँ... कई ख़्वाब खेले पलकों पर फिसले और खाक़ हो गये बीते थे तेरे आगोश में वो लम्हें राख हो गये एक रात गुजरे दर्द के आलम में क़ुछ ऐसी रहनुमाई चाहती हूँ मैं कुछ दिनों तनहाई चाहती हूँ... रफ़्ता-रफ़्ता... [पूरी पोस्ट]
writer Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]

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