इक शाम
बिखरे हुये लम्हों की लडी बना ली है जब चाहे गले मे डाल लीजब चाहे उतार दी झील का सारा पानी उतर आया आँखों में न जाने कितनी गागर खाली हैं तैरता था उसमें तिनका कोई जो यूँ ही आँखों छलक गया कभी हौले से उतरूँ सैलाब की रवानियों में कि मेरी गागर अभी खाली है इन...
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Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]



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