चौथ की रात
चौथ की रात का अंधेला उससे लिपटा चाँद सुनहला जीवन की अविरल छाया सा प्रेम सराबोर स्वच्छ रूप तुम्हारा मेरी विपसना, मेरी तपस्या और सारी नेकियों का सिला चौथ की रात का अंधेला.. विंध्याचल सी अड़िग विभोर निर्मल सुशोभित तेरी काया शशि का तेज़ नेत्रों में हिमकण...
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Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]



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