"तुम्हारी उपमा"
क्यों निहारते हो सुबह से मुझे दिन सारा फिर कहते हो शाम हो गयी मगर दिल नहीं भरा गम की शब में याद आता है वो सिरफिरा जिसकी ज़िन्दगी थी एक सुरंग मैं ही उसका ये सिरा मैं ही उसका वो सिरा तुम कहते हो चुप रहती हूँ मैं अकसर बटोरती रहती हूँ तुम्हारी उपमा के टुक...
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Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]



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