जीवन के दोराहे

मेरी परिक्रमा... जीवन के दोराहे पर खड़ा है मेरा मन एक तरफ मदमस्त जवानी एक तरफ मासूम बचपन नानी की कहानियाँ थीं मौजों की रवानियाँ थीं छत पर पड़ी चारपाई पर अपना डेरा था मुंडेर पर गिरी बेरी पर जुगनुओं का बसेरा था घर से दोपहर में चोरी से भागना बहुत याद आता है, बरगद की जटा... [पूरी पोस्ट]
writer Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]

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