गीत
देखूँ जब पर्वतों को रंग उड कर बादल बन जाता है छू कर गुजरा कोई अभी-अभी मेरा रुआँ झूम जाता है उन चरागों की शमा बुझती नहीं जिनके तले घना अँधेरा होता है तुम्हें अक्सर महसूस करती रूह बहती इन साँसों से नाता है तेरे लिये जग छोड भी दूँ मगर गैरों पर यकीन नहीं...
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Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]



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