गज़ल
सफर कटता रहा नजारे गुजरते रहे निगाहें बोझिल हुईं हम सोचते रहे इश्क़ और फर्ज़ की कशमकश में दामन को अश्कों से निचोडते रहे आहटें कुछ सुनी झोके वो धूल के बाबस्ता दरीचे दिल के खोलते रहे गुबार सन्नाटों में कहाँ निकालते बेखुदी में एक आस खरोचते रहे वफा ही वफा...
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Anupama
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[10 Dec 2008 21:41 PM]



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