शब्द

मेरी परिक्रमा... क़्या तुम्हारे आँगन में अपना पहला कदम रख सकता हूँ शब्द हूँ मैं तुम्हारे लबों का क्या तुमसे व्यक्त हो सकता हूँ... अपनी मर्यादा में कसकर बंधा हुआ हूँ ऊँच नीच जाति भेद में तुला हुआ हूँ क्या मैं तुम्हारे पंखों का आत्मसात कर खुले गगन में उङने का आभास कर सक... [पूरी पोस्ट]
writer Anupama
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[04 Mar 2008 07:40 AM]

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