ग़ज़ल : पत्थ्रर सा जो दिल होता है
पत्थर सा जो दिल होता है, वो फिर किस काबिल होता है । तुझे भूलने की कोशिश ही, काम बड़ा मुश्किल होता है । पहले तिल तिल खुद मरता है , तब कोई का़तिल होता है । कागज़ पर मैं दिल रख देता, जि़क्र सरे महफ़िल होता है । क़हर तो लहरें ही ढ़ातीं हैं, रुस्वा हर साहिल...
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शरद तैलंग
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[19 Jul 2008 07:34 AM]



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