ग़ज़ल : तलवारें जब भी मियान मे...
तलवारें जब भी मियान में ख़ुद को कै़द समझतीं हैं, ऐसा दौर तभी आता है ख़ून की नदियां बहतीं हैं । बचपन हँसी ख़ुशी बीता करता था जिनको सुन सुनकर, वे कहानियाँ दादी के होठों पर आज तड़पतीं हैं । उनका धीरज टूट गया या यह ऐलान-ए-बगा़बत है, बिन मौसम जो आज बदलियाँ चा...
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शरद तैलंग
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[02 Sep 2008 01:31 AM]



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