ग़ज़ल : जब तलक आसमान बाकी है
जब तलक़ आसमान बाक़ी है, पंछियों की उडान बाकी़ है । अभी लंका ही ठीक है सीता, अभी इक इम्तहान बाक़ी है । चीर ज्यों द्रोपदी का बढ़ता गया, उसका अब भी लगान बाकी़ है । शेर पेडो़ पे चढ़ नही पाए, इसलिए ये मचान बाकी़ है । कैसे निर्दोष मैं कहूं खुद को, अभी तेरा बयान...
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शरद तैलंग
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[21 Jul 2008 12:37 PM]



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