ग़ज़ल : यारी जो समन्दर को निभानी..

सब कुछ यारी जो समन्दर को निभानी नहीं आती, ये तय था कश्तियों में रवानी नही आती । वो तो हवा ने हम से दगा़ कर दिया वरना- क्या हम को इक पतंग उडा़नी नहीं आती ? साँपों के शहर में समझिए उसकी मौत है, जिसको सुरीली बीन बजानी नहीं आती । सारे सुबूत अपनी जुबां बन्द जो र... [पूरी पोस्ट]
writer शरद तैलंग
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[22 Jul 2008 03:58 AM]

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