सूरज को अभी देर है
हवा का इक झोँका था , मैनें द्वार तक सजा लिया सूरज को अभी देर है , तेरे घर तक आने में इक सपना दिखाने को आँख लगी हो जैसे ठगे से देखते हैं गुलशन की नाउम्मीदी को तूने अपनी ही कोई बात कही हो जैसे रूठा है मेरा अपना ही , मुझसे मेरा सँसार कहीं तेरी हर पीड़ प...
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शारदा अरोरा
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[17 Apr 2009 04:00 AM]



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