दोपहर का गान

हरी मिर्च चलने लगा, चलता गया, बनता गया, मैं भी शहर बेमन हवा, लाचार गुल, ठहरी सिसक, सब बेअसर रोड़ी सितम, फौलाद दम, इच्छा छड़ी, कंक्रीट मन उठने लगी, अट्टालिका, बढ़ती गयी, काली डगर कमबख्त कम, पैदा हुआ, सीखा हुआ, वैसा नहीं जिस रंग में, बदरंग था, उस ढंग में, सांचा कहर... [पूरी पोस्ट]
writer जोशिम
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[02 Jan 2008 12:52 PM]

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