घुमक्कड़नामा -शून्य

हरी मिर्च टहलते,टहलते, गमक गुनगुनाते, रास्ते चमकते, चमक रूठ जाते लरजते बरजते, खयालों में आते, रातों में छपते, छपक टूट जाते बहानों से किस्से, गुमानों के मंज़र तरीके बदलते रहे ख़ास अवसर सलीके सुलझते अगर चैन पाते वहीं आ गए इस सहर, घूमफिरकर रिझाते ज़हन को कहीं थाम... [पूरी पोस्ट]
writer जोशिम
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[19 Jan 2008 14:43 PM]

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