चुप : गरमी के मौसम में
खिड़की खुली रक्खें, हवा से चोर झोंके आएंगे, पीठ पल्लों पर धरेंगे, मौन को बहलाएंगे । जालियों से जूझ कर के, राहतों को मूँद कर के, उलझनों के वाक्य आधे, बाबतों की बूँद भर के, ओंठ पर अठखेलियाँ कर, शब्द पढ़ कर गाएंगे, गीत छंदों से खुलेंगे, मुक्त हो उड़ जाएं...
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जोशिम
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[17 May 2008 15:35 PM]



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