कथाहारा
मर्म के सब पाँव बोझिल हो चुके हैं टीस के तलवे तले फटती बिवाई, रिस गई है रोज़मर्रा रोशनाई, प्रीत के पद / राज़ अंतर्ध्यान हो कर खो चुके हैं। योजना की भीड़ में सहमे सफ़े सबहाल, बेसरपैर बातों के घुले दिन साल, आदम-काल, बिखरी पीड़ के निर्वाण के पल धो चुके है...
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जोशिम
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[01 Aug 2008 15:04 PM]



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