देवेन्द्र रिणवा की कविता

भोर सृजन संवाद याद नहीं आता जैसे याद नहीं आता कि कब पहनी थी अपनी सबसे प्यारी कमीज आखिरी बार कि क्या हुआ उसका हश्र सायकल पोंछने का कपड़ा बनी छीजती रही मसौता बन किसी चौके में कि टंगी हुई है किसी काक भगोड़े की खपच्चियों पर याद यह भी नहीं आता कि पसीने में सनी कमाज की त... [पूरी पोस्ट]
writer प्रदीप मिश्र
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[23 May 2008 07:19 AM]

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