कवि रे, कर अब निर्मम गान

नवागंतुक बीत गई वह निशा सुखद- सी, टूटा अम्बर का अभिमान; सारे उसके हँसते माणिक , बिखरे भू पर हो निष्प्राण । उदयाचल की ओर जरा लख, क्षीण हुई सारी श्री , मान ; रजतरश्मियाँ क्षीण हो उठीं, लुप्त हुए विभु के यश गान । मधुरम कंठस्वर को तज रे, कवि तू कर अब निर्मम गान ।... [पूरी पोस्ट]
writer Alok Shankar
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[20 Feb 2007 09:45 AM]

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