याद
कोई हँसी न खुशबू देगी कहीं, दीवारें कुछ गढ़ जायेंगीं , पत्थर , चंदन , शबनम, धागों की आवाज़ें रह जायेंगीं । आड़ी तिरछी तसवीरों की, रंगीं बातें बह जायेंगीं ; जब धुँध कहीं पर कम होगा, तेरी बातें रह जायेंगीं । जिंदगी , आवाज़ तेरी , बुझ गयी तो क्या करुँगा ? य...
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Alok Shankar
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[30 Mar 2007 16:01 PM]



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