हाथ होते गर हजारों

नवागंतुक आदमी यह सोचता है, काश अपने पंख होते, तो गगन में उड़ रहे हम खग-सदृश निःशंक होते । आज जीवन में हमारे उलझनें जो आ पड़ीं हैं, और यदि सामर्थ्य से लगने लगी विपदा बड़ी है । दीप यदि उम्मीद का , होकर विवश बुझने लगा है, और मन का दीप्त कोना ज्योति से चुकने लगा है... [पूरी पोस्ट]
writer Alok Shankar
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[07 Apr 2007 18:14 PM]

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