धरती और आसमान
जब भी कुछ फ़ुरसत मिलती है, कुछ आसमान चढ़ लेते हो ; अम्बर की गर्वित ऊँचाई , को थोड़ा कम कर देते हो । सपनों के उड़ते बादल को डोरी से खींच धरातल पर, साँचे में उसको ढाल- ढाल कर मूर्त्त,बना देते प्रस्तर । विस्मित है यह ब्रह्मांड सकल लखकर तेरा पुरुषार्थ प्रबल...
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Alok Shankar
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[03 Aug 2007 08:24 AM]



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