गज़ल
महफ़िलों की नीयतें बदल गयीं हैं आजकल महमिलों से आजकल शराब निकलती नहीं क़ातिलों के कायदे खुदा भी जानता नहीं जान गई पर मुई हिज़ाब निकलती नहीं जिन्दगी जवाब चाहती हरेक ख्वाब का ख्वाब बह गये मगर अज़ाब निकलती नहीं ख़्वाहिशों के अश्क हैं हज़ार मौत मर रहे कब्रगाह...
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Alok Shankar
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[15 Jan 2008 02:10 AM]



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