टीस
कमरे के बियाँबान में काँटों को छूती हुई अष्टावक्र सी दिखती हुई एक आकृति लेटी है, या बचना चाहती काँटों से बदन पर लिख रहे अँधेरों से-- शरीर के गँदले पर चीरे की कालिख़ दुखती है आह! यह पिंजर!! पिंजर !! फड़फड़ाते हुए विखंडित पंख , मिरगी-से काँपते -उछलते फड़...
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Alok Shankar
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[09 Feb 2009 12:27 PM]



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