नवागंतुक

नवागंतुक उजालों की जानिब कहाँ जिन्दगी है दहकती सुबह ,खौलता आसमाँ है चलो ढूँढ़ते हैं गमों का बहाना बहुत देर से रोशनी का समाँ है । बहुत चाँदनी जी चुकी हैं निगाहें कि आँखों में सीलन है,कोहरा घना है न अब ख्वाब डालो हमारी नसों में उनींदे समय को जरा जागना है । कहीं... [पूरी पोस्ट]
writer Alok Shankar
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[09 Feb 2009 12:25 PM]

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