चाँद पे पंहुचे हम भी - एक ख़याल

राजेश गुप्ता आपसे रूबरू चाँद पे पडी नज़र वो जा रहा था बेखबर पूछा मैंने रोककर ऐ बादलों के हमसफ़र खफा है क्यों तू इस कदर कि देखता नहीं इधर बिना जवाब के मगर चल दिया अपनी डगर अपना मन मसोस कर हम भी आ गए हैं घर उदास हैं ये सोचकर जो रहते हैं ज़मीन पर मिलना नहीं उन्हें अगर चांदनी का... [पूरी पोस्ट]
writer WindEnergyMan
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[04 Nov 2008 01:27 AM]

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