कबीरा कहिन
कबिरा प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय । रोम रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥ जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास । जो है जाको भावता, सो ताही के पास ॥ प्रीतम के पतियाँ लिखूँ, जो कहुँ होय बिदेस । तन में मन में नैन में, ताको कहा सँदेस ॥ नैनन की करि कोठर...
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Suresh Chnadra Gupta
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[05 Dec 2008 23:42 PM]



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