वाङ्मय
कविता हम मॉंझी हुए फटी नाव के प्रेमशंकर मिश्र धूप के हुए न हुए छझांव के हम मॉंझी हुए फटी नाव के। चलना फिरना हंसना बोलना किस्त किस्त क़रजो की वापसी इनकी उनकी पीली नीली बातें ऑंच चढ़े उड़ जाती भाप सी ऐसे में कैसे कोई पंक्षी पर साधे छिन पछुवा, छिन पछियांव...
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[20 Jul 2008 13:29 PM]



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