रात की चाय
अच्छा लगता है न शीषॆक पढ़कर. रात की चाय। जीभें लपलपा उठती हैं और मन बरबस उस चाय वाले के यहां चहल-कदमी करने लगता है, जहां कल रात चाय पी थी. हममें से कितनों को ये मौका रोजाना मयस्सर होता है, कहा नहीं जा सकता. मेरी इच्छा हमेशा रहती है, मौके कभी-कभार ही...
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रमेंद्र
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[22 Sep 2007 04:36 AM]



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