नागार्जुन के दो रंग
बैठे-बैठे सोच रहा था तब तक नागार्जुन हाथ में आ गए। पेश है उनके दो रंग यह तुम थीं कर गयी चाक तिमिर का सीना जोत की फांक यह तुम थीं सिकुड़ गयी रग-रग बनाकर ठूंठ छोड़ गया पतझार उलंग असगुन सा खडा रहा कचनार अचानक उमगी डालों की संधि में छरहरी टहनी पोर-पोर मे...
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रमेंद्र
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[17 Nov 2007 15:57 PM]



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