कह गया था

कुछ ग़ज़ल कुछ गीत ! कह गया था, मगर नहीं आया;वो कभी लौट कर नहीं आया।क़ाफिले में तमाम लोग थे पर,बस वही हमसफ़र नहीं आया।रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;किंतु मेरा शहर नहीं आया।ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,आ तो सकता था, पर नहीं आया।एक मेरी बिसात क्या, सुख तोजाने कितनों के घर नही... [पूरी पोस्ट]
writer Dr. Amar Jyoti
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[21 Nov 2008 04:05 AM]

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