यादों के दीपक जलते हैं

कुछ ग़ज़ल कुछ गीत ! बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैंजाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैंसिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती हैराह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती हैलोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहतेऔर रात की ज़ुल्फ़ें काली रह... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[24 Nov 2008 20:40 PM]

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