लक्षण हैं चढ़ रही उमर के
संभल संभल जब उठते हैं पग, अमराई की राहगुजर पेअरे रूपसि ! निश्चित मानो, लक्षण हैं चढ़ रही उमर केधुंधली आकॄतियों के बिम्बों में मन उलझ उलझ जाता हैएक अधूरा छंद अधर पर पाहुन बन बन कर आता हैअभिलाषा की हर अँगड़ाई टूट टूट कर रह जाती हैनिमिष मात्र भी एक बिन्दु...
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राकेश खंडेलवाल
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[08 Dec 2008 20:07 PM]



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