चित्र मावस का था, रंग भरते रहे
राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ीऔर हम हर कदम पर संभलते रहेकट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुएस्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहेचाह अपनी हर इक टंग गई ताक परमन में वीरानगी मुस्कुराती रहीआस जो भी उगी भोर आकाश मेंसाँझ के साथ मातम मनाती रहीअधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सकेवक्त म...
[पूरी पोस्ट]
राकेश खंडेलवाल
8
0
0
0
0
[16 Dec 2008 20:35 PM]



Shuffle








