दूर का मसला
दूर का मसला घरों तक आ रहा हैबाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के; फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस काजीविका के अवसरों तक आ रहा है।इसने...
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Dr. Amar Jyoti
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[19 Dec 2008 06:52 AM]



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