आपकी राह उन मोतियों से सजे
फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँमांग कर ईश से रंग आशीष केआपके पंथ की अल्पना मे भरूँफिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान मेंभर रखूँ, आपकी भोर की मेज परन हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँफिर ये आशा करूँ जो...
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राकेश खंडेलवाल
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[29 Dec 2008 21:04 PM]



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