इसी इन्तिज़ार मे
आजा अंधेरी राते तन्हा बिता चुका हूँ शमा जहा ना जलती आंखे जला चुका हूँ तुम आओगे किसी दिन इसी इन्तिज़ार मे नजाने कितनी हसरते मिटा चुका हूँ ये चन्द आहे ये चन्द आंसू सिवा-ए-इनके बचा ही क्या है ज़माना क्या छीन लेगा हमसे किसी ने हमको दिया ही क्या है ...Ravi...
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Ravi Srivastava
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[04 Sep 2008 06:57 AM]



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