दौर-ऐ-इश्क
गुज़र रही थी ज़िन्दगी अपने ही तौर से , नज़र लगी किसी की , मिले हम इश्क - ऐ - दौर से , हंसने लगी है दर्पण , कलम भी मुस्कुराई , ये मैं ही हूँ , या मिल रही हूँ शक्श - और से ? हर वक्त दिल पर मची हुई परछाईयों की चीख ! कैसे करुँ मैं बंद कान हरसू ये शोर से ,...
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kavitaprayas
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[02 Sep 2008 16:53 PM]



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