गंगा मौसी !
धन्यवाद देती हूँ श्री शरद तैलंग जी को जिन्होंने इस कविता की खामियां निकाल कर इसे तराशा है | इस कविता की पूर्णता में शरदजी का बहुत बड़ा हाथ है | धन्यवाद शरदजी ! किसी देश में नदी किनारे , था मेरा एक गाँव, धेनु, धरा , धन, धाम प्रचुर था, थी पीपल की छाँव,...
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kavitaprayas
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[05 Sep 2008 19:01 PM]



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