फिर ज़िन्दगी के दांव पेंच चलने लगे हैं !
किस राह पे हम आज यूँ ही चलने लगे हैं ? आप ही के रंग में क्यूँ ढलने लगे हैं? मोम का जिगर है तो बचें जी आग से, हाय ! क्या करें जो आह से पिघलने लगे हैं .... गरूर था कि आपको भी अपने सा बना देंगे, अब ख़ुद को देख , हाथ अपने मलने लगे हैं ... बताये ये कोई हम...
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kavitaprayas
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[26 Sep 2008 13:43 PM]



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