विवशता

मेरी डायरी कमजोर, कातर नेत्रों से ताकती हुई. गिन रही थी, दो चार पल जिंदगी के. गुन रही थी, हुई क्या उससे ख़ता. बूचड़खाने कटने खड़ी थी. क्या थी उसकी विवशता? ( 5th Feb. 1994)... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. अजीत कुमार
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[07 May 2008 11:34 AM]

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