दारोगाजी की मूंछ - २
और एक दिन अचानक ही मुंशी नौरंगीलाल की जासूसी रंग लाई. करीब रात के बारह बजे वे रात के अंधेरे में अपने घर के पिछवाडे में खड़े हो गए. कर की तरह कान लगाए हुए थे, इधर-उधर कुछ सुनने के लिए कान लगाए हुए. तबतक उनकी नज़र मोड़-माड कर फेके गए कागज़ के टुकड़े पर पडी...
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विजय ठाकुर
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[24 Oct 2008 22:37 PM]



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