डिब्बाबंद मुल्क, बड़ी होती लड़की और मातृत्व की उलझी छवियां -1
करीब ढाई साल गुजरे उस बात को, जब मेरी एक कजिन, जो हमारे ठेठ सामंती, ब्राम्हण परिवार में साफ दिल वाली एक लड़की थी, ने एक बेटी को जन्म दिया। मैं मुंबई गई थी, तब बिल्कुल अकेली थी। ननिहाल, तीन मौसियों और बुआ के घरों वाले उस शहर में कोई अपना नहीं था। ए...
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मनीषा पांडे
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[23 Feb 2008 07:07 AM]



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