मन का अरण्य
उनसे मिलना हुआ था जैसे किसी और महाद्वीप से आई हवा हो। मैं रुकी थी थोडी और गहरी साँस लेने के लिए। उसकी खुशबू में जैसे उस मिट्टी की सौंधी खुशबू थी जहाँ से मैं विस्थापित हुई थी। जानती थी मैं इस महाद्वीप का हिस्सा हूँ। मेरे पास अपनी ज़मीन थी, जिसका मौसम...
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Beji
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[20 Dec 2008 02:10 AM]



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